एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी -दि.06/04/2023- 21 वीं सदी का हिंदी साहित्य:चेतना और चिंतन के विविध आयाम



एक दिवसीय राष्टीय संगोष्टी के समय उपस्थित मान्यवर 
राष्ट्रीय संगोष्ठी सफल बनाने के लिए सक्रिय सहयोग एवं आर्थिक सहायता करनेवाले श्री.अजय जाधव जी के भांजे श्री.मयूर निकम तथा गणित विभागाध्यक्ष प्रा.मुरलीधर चौगुले का विशेष आभार करते हुए हिंदी विभाग प्रमुख एवं उपस्थित अन्य मान्यवर।

शिक्षणमहर्षि डॉ. बापूजी साळुंखे महाविद्यालय में एक                दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

मिराज : गुरूवार दि. 06 अप्रैल, 2023 को शिक्षणमहर्षि डॉ. बापूजी साळुंखे महाविद्यालय में '21वीं सदी का हिंदी साहित्य: चेतना और विचार का आयाम' विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन महाविद्यालय के हिंदी विभाग एवं शिवाजी विद्यापीठ हिंदी प्राध्यापक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजन किया गया। 


(बाएँ से - प्रो.डॉ. सुनील बनसोडे, मा. प्र. प्राचार्य, प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे, मा. प्राचार्या डॉ. शैलजा साळुंखे, मा.प्रो. (डॉ.) अर्जुन चव्हाण, मा. प्रो. (डॉ.) श्यामरव राठौड, प्रा. यशवंत गायकवाड) 

 

प्रतिमापूजन और दीपप्रज्वलन के समय उपस्थित मान्यवर  (बाएँ से - श्री. अनिल पवार (रजिस्ट्रार), प्रो.(डॉ.) व्ही. डी. सूर्यवंशी, प्रो. (डॉ.) सुनिल बनसोडे, प्रो. (डॉ.) अर्जुन चव्हाण, मा. प्राचार्या (डॉ.) शैलजा साळुंखे, प्रो. (डॉ.) श्यामरव राठौड, मा. प्र. प्राचार्य, प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे, प्रा. यशवंत गायकवाड, प्रा. सुनिल कांबळे, श्री. रावसाहेब लवते (अधीक्षक), प्रा. विक्रमसिंह भोसले )

(एक दिवसीय राष्ट्रीय सांगोष्ठी के उद्घाटक मा.प्राचार्या, डॉ.  शैलजा साळुंखे मॅडम जी को शोल, श्रीफळ और पुष्पगुच्छ देकर  स्वागत करते हुए  मा. प्र. प्राचार्य प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे जी ) 

बीजभाषक - मा. प्रो.(डॉ.) अर्जुन चव्हाण( प्रोफेसर एवं पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, शिवाजी विद्यापीठ, कोल्हापूर) जी का  शाल , श्रीफळ और पुष्पगुच्छ देकर  स्वागत करते हुए  मा. प्र. प्राचार्य प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगेजी )


विषय विशेषज्ञ मा. प्रो. (डॉ.) श्यामराव राठौड (हिंदी विभागध्यक्ष, अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद) जी का  शाल, श्रीफळ और  पुष्पगुच्छ देकर  स्वागत करते हुए  मा. प्र.प्राचार्य प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे जी )

(मा. प्रो. डॉ. सुनील बनसोडे (अध्यक्ष, शिवाजी विद्यापीठ हिंदी प्राध्यापक परिषद) जी का शाल, श्रीफळ और पुष्पगुच्छ देकर स्वागत करताना मा. प्र. प्राचार्य मा. प्र.प्राचार्य प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे जी )

प्रस्तुत कार्यक्रम में प्रा. डॉ. सुनील कांबळे (समन्वयक-आय,क्यू.ए.सी.) संगोष्ठी के संयोजक प्रो.यशवंत गायकवाड़, सहसंयोजक प्रा. नीलेश जाधव और प्रा. डॉ. निशाराणी देसाई और महाविद्यालय के सभी गुरूदेव कार्यकर्ता, बाहर के महाविद्यालय से आए प्राध्यापक, अंनुसंधात, पत्रकार एवं अन्य मान्यवर, प्रशासकीय कर्मचारी, सेवक वर्ग और छात्र-छात्राओं की उपस्थिति में संपन्न हुआ।


(मा. प्राचार्या, डॉ.  शैलजा साळुंखे , माजी प्राचार्या, आक्काताई रामगोंडा पाटील कन्या महाविद्यालय, इचलकरंजी)

संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह में मौकेपर बोलते हुए, मा. प्राचार्या डॉ. शैलजा सालुंखे जी ने कहा कि, "हिंदी भाषा बहुत तरल, सुसंस्कृत, प्रवाहमान, श्रव्य और हृदय से हृदय को जोडने वाली भाषा है। हिंदी भाषा पानी की तरह पारदर्शी है, यह किसी भी भाषा के साथ आसानी से एकरूप हो जाती है। भारत के विभिन्न हिस्सों जैसे- बंगाल, लखनऊ, इलाहाबाद, झांशी, महाराष्ट्र आदि राज्य में हिंदी भाषा के विभिन्न रूप हैं। समय के साथ भाषा में बदलाव हुआ है, लेकिन भाषा ने अपनी मूल विशेषताओं को संरक्षित और विकसित किया है। हिंदी और मराठी बहन भाषाएं हैं जो संस्कृत भाषा से उत्पन्न हैं तथा इनकी लिपि देवनागरी है। उन्होंने सूरदास, कबीर, मीराबाई, तुलसीदास, मुंशी प्रेमचन्द्र, मोहन राकेश, राघेय राघव, प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त आदि प्राचीन से लेकर आधुनिक हिंदी साहित्य तक के में मन को द्र्वीत करने वाला साहित्य है ऐसे संबोधित किया ।

बीजभाषक  मा. प्रो. (डॉ.) अर्जुन चव्हाण मार्गदर्शन करते हुए तथा व्यासपीठपर विराजमान मान्यवर

मा. प्रो डॉ. अर्जुन चव्हाण ने अपने उद्बोधन में कहा कि, "यह संगोष्ठी इक्कीसवीं सदी के साहित्यकार की चेतना और चिंतन पर आधारित है। यदि चेतना और चिंतन न होता तो विमर्श  की लहरें न उठती। वर्तमान में, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, किन्नरों और किसानों पर केंद्रित साहित्य का निर्माण कियाजा रहा है। विमर्श  21वीं सदी की महान देन है। इक्कीसवीं सदी के साहित्यकार लेखन के माध्यम से समाज में होने वाली घटनाओं, विभिन्न परिवेशों की संस्कृति को दर्शाते हैं जिससे एक विशिष्ट ऐसे नए विमर्श और उसके साहित्य की रचना करते नये साहित्यकारों को देख सकते हैं। हालांकि ऐसा करते समय शब्दों का प्रयोग संभलकर करना होगा। जैसे- उन्होंने वृद्ध विमर्श के बारे में कहा कि विमर्श कभी वृद्ध नहीं होती। वह सदा चिरतरुण है। बाल विमर्श  और वृद्धावस्था पर साहित्य वर्तमान में बढ़ रहा है। यह तथ्य कि वर्तमान में वृद्धाश्रमों की संख्या में वृद्धि हो रही है, यह संस्कृति के विनाश का संकेत है। पश्चिमी संस्कृति के प्रति भारत का आकर्षण बढ़ता जा रहा है, जबकि पश्चिमी लोग भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षित हैं। 21वीं सदी में साहित्य के चेतना और चिंतन के विभिन्न आयाम शोध का एक नया विषय है। कानून सर्वोच्च है, भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। इसे ध्यान में रखकर ही लेखन करना चाहिए। शिक्षा ने सभी को बोलने का अधिकार दिया है। साहित्य परिवर्तनशील है, इसलिए दुनिया में तरह-तरह की क्रांतियां होती रहती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिवमंगल सिंह 'सुमन' हिन्दी साहित्य के महान लेखक थे।'

(महाविद्यालय के  मा. प्र प्राचार्य  प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे जी आपना मंतव्य व्यक्त करते हुए ) 

महाविद्यालय के प्र. प्राचार्य मा. प्रा. डॉ. सतीश घाटगे जी ने आपने मंतव्य में  कहा कि, “प्रत्येक भाषा की संरचना और सौंदर्य अलग होता है । विश्व में तीसरे स्थान पर बोली और समझी जाने वाली भाषाओं में से एक भाषा है । हिंदी भाषा ने  21 वी सदी में अन्य भाषाओं को अपना अस्तित्व ब्ंनाए रखने की चुनौती दी है । आधुनिक काल के  साहित्य में वास्तववादी चित्रण ज्यादा मात्रा में होना अपेक्षित है, लेकिन वास्तव को बाजू में रखने का प्रयास कर बाजारवादी साहित्य की निर्मिति करते साहित्य कारों पर जमकर प्रहार किया। 

सांगोष्ठी को सफल बनाने के लिए जिन-जिन लोगों ने सहायता की जिसमें महाविद्यालय के सेवक श्री. अजित जाधवजी के भांजे मा.श्री. मयूर दिलीप निकम जिन्होंने नगद रुपए देकर, तथा बसवअण्णा मिठाईवाले मा. श्री. नितिन बसवआण्णा चौगुले और सांगोष्ठी के लिए फाईल देनवाले मा. श्री. विरेंद्र हालिंगली (अल्टिमेट कलेक्शन विश्रांबाग, सांगली) तथा प्रस्तुत फाईल में दिए जाने वाला लेटर पॅड और पेन देनेवाले महाविद्यालय के गुरूदेव कार्यकर्ता मा. प्रा. मुरलीधर चौगुले आदि के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित न करते हुए मै इन सभी महानुभावों के ऋण में रहना पसंद करूंगा ऐसे मंतव्य व्यक्त किया। साथ ही इन सभी दाताओं के पास पहुंचने में मदद करने वाले शारीरिक शिक्षण संचालक प्रा. आकाशा बनसोडे तथा कॉमर्स विभाग अध्यक्षा प्रा. (डॉ.) शाहिदा जमादार के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित की। साथ ही सांगोष्ठी को सफल बनाने के लिए बनाई गयी सभी समिति और उसमें कार्य करने वाले सभी सदस्यों के प्रति तथा प्रशासकीय कर्मचारी और सभी सेवक जिन्होंने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। सांगोष्ठी को शुरू से आखीर तक मार्गदर्शन करने वाले मा. प्रो. (डॉ.) अर्जुन चव्हाण जी के प्रति विशेष कृतज्ञता ज्ञापित की। विषय विशेषज्ञ मा. प्रो. (डॉ.) श्यामराव  राठौड जी के प्राति भी कृतज्ञता ज्ञापित की।          

प्रस्तुत सांगोष्ठी के विषय विशेषज्ञ मा. प्रो. डॉ. श्याम राठौड जी मार्गदर्शन करते हुए ।

माननीय। प्रो. (डॉ.) श्यामराव राठौड़जी  ने 'हिंदी काव्य एवं गद्य साहित्य में चेतना के विविध आयाम' विषय पर विस्तृत मार्गदर्शन किया। उन्होंने अपने मार्गदर्शन में कहा कि, “हिंदी साहित्य का इतिहास हिंदू क्षेत्र का इतिहास है। हिन्दी साहित्य में दक्षिण भारत उपेक्षित है। आज हर कोई दलितों, महिलाओं, आदिवासियों पर लिखना चाह रहा है। लेकिन इन लेखकों को इनमें कोई दिलचस्पी नहीं है, बल्कि जो बाजार में बिक रहा है, उस पर लिख रहे हैं। 21वीं सदी के लेखक समाज में व्याप्त असमानता की हकीकत को निडर होकर अपने पाठकों के सामने रख रहे हैं। आज का साहित्य मनोरंजन के स्थान पर पीड़ा, शोषण, 

मातम-तनाव को चित्रित करता है। साहित्य की उत्पत्ति समाज से होती है, साहित्य को समाज का दर्पण होना चाहिए, उसमें समाज के सभी लोगों का चित्रण होना अपेक्षित है। उन्होंने आगे कहा, दलित साहित्य को बहुत आलोचना का भी सामना करना पड़ता है, क्योंकि कुछ लोगों का मत है कि दलित साहित्य साहित्य का एक अलग रूप नहीं है। यह दलित साहित्य आंदोलन की कोख से बिना दया की भीख मांगे परिवर्तन के लिए एक जागरूक लेखन है। इस समाज में चेतना, जागरूकता, शिक्षा का श्रेय फुले-अंबेडकर को देना होगा, जो समाज में मौजूद नहीं है, उसे साहित्य में भी चित्रित किया जाना चाहिए। आज एक ओर जहां हम आजादी के अमृत का उत्सव मना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समाज में जातिगत भेदभाव और लैंगिक भेदभाव भी बढ़ रहा है। इसको काहीं तो रोख लगानी आवश्यक है ऐसे अपने उद्बोधन में कहा।  


प्रस्तुत सांगोष्ठी का प्रास्ताविक संयोजक - प्रा.यशवंत गायकवाड जी करते हुए।

सांगोष्ठी के सहसंयोजक - प्रा. नीलेश जाधव जी आभार ज्ञापन करते हुए।

संपूर्ण सांगोष्ठी का सूत्रसंचालन करते हुए सहसंयोजक - प्रा. (डॉ.) निशाराणी देसाई और प्रा. आसमा बेग जी ने किया।

आलेख का शीर्षक ; जितेंद्र श्रीवास्तव के काव्य में चेतना के आयाम   

प्रातिनिधिक फोटो - आलेख पठन करने वाली प्रा. प्रिया ए. (के.जी. कॉलेज, पाम्पाडी, कोट्टयम - केरला )



शोधालेख का शीर्षक : भागवानदास मोरवाल के उपन्यास ‘सुर बांजरन’ में नौटंकी कला चिंतन

आलेख पठन करने वाली - सुश्री. वर्षा कांबळे (शोधछात्र – शिवाजी विद्यापीठ, कोल्हापुर)

छात्राओं द्वारा निकाली अप्रतिम रंगोली   

इस संगोष्ठी में दार्जिलिंग, केरल, बैंगलोर और महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों के 130 से अधिक प्रोफेसरों, शोधकर्ताओं और छात्रों ने भाग प्रतिभागी के रूप में हिस्सा लिया। इस अवसर पर दस शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र पढ़े और जिपर विवेकपूर्ण विचारों से मंथन हुआ। कार्यशाला पर आपनी प्रतिक्रिया देते हुए प्रा. डॉ. भास्कर भवर ने सांगोष्ठी के शीर्षक और सांगोष्ठी के नियोजन हेतु कार्य कर रही पूरी टीम के कार्य  की तारीफ की। इस सांगोष्ठी हेतु महाविद्यालय के कनिष्ठ एवं वरिष्ठ विभागों के सभी गुरुदेव कार्यकर्ता, प्रशासनिक कर्मचारी एवं सेवक, छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित थे।








शिक्षणमहर्षि डॉ. बापूजी साळुंखे महाविद्यालय में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

मिराज : गुरूवार दि. 06 अप्रैल, 2023 को शिक्षणमहर्षि डॉ. बापूजी साळुंखे महाविद्यालय में '21वीं सदी का हिंदी साहित्य: चेतना और विचार का आयाम' विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन महाविद्यालय के हिंदी विभाग एवं शिवाजी विद्यापीठ हिंदी प्राध्यापक परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजन किया गया। 


(बाएँ से - प्रो.डॉ. सुनील बनसोडे, मा. प्र. प्राचार्य, प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे, मा. प्राचार्या डॉ. शैलजा साळुंखे, मा.प्रो. (डॉ.) अर्जुन चव्हाण, मा. प्रो. (डॉ.) श्यामरव राठौड, प्रा. यशवंत गायकवाड) 

संस्था दैवत प्रतिमापूजन आणि दीपप्रज्वलन प्रंसंगी उपस्थित सर्व मान्यवर (बाएँ से - श्री. अनिल पवार (रजिस्ट्रार), प्रो.(डॉ.) व्ही. डी. सूर्यवंशी, प्रो. (डॉ.) सुनिल बनसोडे, प्रो. (डॉ.) अर्जुन चव्हाण, मा. प्राचार्या (डॉ.) शैलजा साळुंखे, प्रो. (डॉ.) श्यामरव राठौड, मा. प्र. प्राचार्य, प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे, प्रा. यशवंत गायकवाड, प्रा. सुनिल कांबळे, श्री. रावसाहेब लवते (अधीक्षक), प्रा. विक्रमसिंह भोसले )

(एक दिवसीय राष्ट्रीय सांगोष्ठी च्या उद्घाटक मा. प्राचार्या, डॉ.  शैलजा साळुंखे मॅडम जी का  शोल, श्रीफळ और पुष्पगुच्छ देकर  स्वागत करते हुए  मा. प्र. प्राचार्य प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे जी ) 

बीजभाषक - मा. प्रो.(डॉ.) अर्जुन चव्हाण( प्रोफेसर एवं पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, शिवाजी विद्यापीठ, कोल्हापूर) जी का  शाल , श्रीफळ और पुष्पगुच्छ देकर  स्वागत करते हुए  मा. प्र. प्राचार्य प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगेजी )


विषय विशेषज्ञ मा. प्रो. (डॉ.) श्यामराव राठौड (हिंदी विभागध्यक्ष, अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद) जी का  शाल, श्रीफळ और  पुष्पगुच्छ देकर  स्वागत करते हुए  मा. प्र.प्राचार्य प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे जी )

(मा. प्रो. डॉ. सुनील बनसोडे (अध्यक्ष, शिवाजी विद्यापीठ हिंदी प्राध्यापक परिषद) जी का शाल, श्रीफळ और पुष्पगुच्छ देकर स्वागत करताना मा. प्र. प्राचार्य मा. प्र.प्राचार्य प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे जी )

प्रस्तुत कार्यक्रम में प्रा. डॉ. सुनील कांबळे (समन्वयक-आय,क्यू.ए.सी.) संगोष्ठी के संयोजक प्रो.यशवंत गायकवाड़, सहसंयोजक प्रा. नीलेश जाधव और प्रा. डॉ. निशाराणी देसाई और महाविद्यालय के सभी गुरूदेव कार्यकर्ता, बाहर के महाविद्यालय से आए प्राध्यापक, अंनुसंधात, पत्रकार एवं अन्य मान्यवर, प्रशासकीय कर्मचारी, सेवक वर्ग और छात्र-छात्राओं की उपस्थिति में संपन्न हुआ।


(मा. प्राचार्या, डॉ.  शैलजा साळुंखे , माजी प्राचार्या, आक्काताई रामगोंडा पाटील कन्या महाविद्यालय, इचलकरंजी)

संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह में मौकेपर बोलते हुए, मा. प्राचार्या डॉ. शैलजा सालुंखे जी ने कहा कि, "हिंदी भाषा बहुत तरल, सुसंस्कृत, प्रवाहमान, श्रव्य और हृदय से हृदय को जोडने वाली भाषा है। हिंदी भाषा पानी की तरह पारदर्शी है, यह किसी भी भाषा के साथ आसानी से एकरूप हो जाती है। भारत के विभिन्न हिस्सों जैसे- बंगाल, लखनऊ, इलाहाबाद, झांशी, महाराष्ट्र आदि राज्य में हिंदी भाषा के विभिन्न रूप हैं। समय के साथ भाषा में बदलाव हुआ है, लेकिन भाषा ने अपनी मूल विशेषताओं को संरक्षित और विकसित किया है। हिंदी और मराठी बहन भाषाएं हैं जो संस्कृत भाषा से उत्पन्न हैं तथा इनकी लिपि देवनागरी है। उन्होंने सूरदास, कबीर, मीराबाई, तुलसीदास, मुंशी प्रेमचन्द्र, मोहन राकेश, राघेय राघव, प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त आदि प्राचीन से लेकर आधुनिक हिंदी साहित्य तक के में मन को द्र्वीत करने वाला साहित्य है ऐसे संबोधित किया ।

बीजभाषक  मा. प्रो. (डॉ.) अर्जुन चव्हाण मार्गदर्शन करते हुए तथा व्यासपीठपर विराजमान मान्यवर

मा. प्रो डॉ. अर्जुन चव्हाण ने अपने उद्बोधन में कहा कि, "यह संगोष्ठी इक्कीसवीं सदी के साहित्यकार की चेतना और चिंतन पर आधारित है। यदि चेतना और चिंतन न होता तो विमर्श  की लहरें न उठती। वर्तमान में, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, किन्नरों और किसानों पर केंद्रित साहित्य का निर्माण कियाजा रहा है। विमर्श  21वीं सदी की महान देन है। इक्कीसवीं सदी के साहित्यकार लेखन के माध्यम से समाज में होने वाली घटनाओं, विभिन्न परिवेशों की संस्कृति को दर्शाते हैं जिससे एक विशिष्ट ऐसे नए विमर्श और उसके साहित्य की रचना करते नये साहित्यकारों को देख सकते हैं। हालांकि ऐसा करते समय शब्दों का प्रयोग संभलकर करना होगा। जैसे- उन्होंने वृद्ध विमर्श के बारे में कहा कि विमर्श कभी वृद्ध नहीं होती। वह सदा चिरतरुण है। बाल विमर्श  और वृद्धावस्था पर साहित्य वर्तमान में बढ़ रहा है। यह तथ्य कि वर्तमान में वृद्धाश्रमों की संख्या में वृद्धि हो रही है, यह संस्कृति के विनाश का संकेत है। पश्चिमी संस्कृति के प्रति भारत का आकर्षण बढ़ता जा रहा है, जबकि पश्चिमी लोग भारतीय संस्कृति के प्रति आकर्षित हैं। 21वीं सदी में साहित्य के चेतना और चिंतन के विभिन्न आयाम शोध का एक नया विषय है। कानून सर्वोच्च है, भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। इसे ध्यान में रखकर ही लेखन करना चाहिए। शिक्षा ने सभी को बोलने का अधिकार दिया है। साहित्य परिवर्तनशील है, इसलिए दुनिया में तरह-तरह की क्रांतियां होती रहती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिवमंगल सिंह 'सुमन' हिन्दी साहित्य के महान लेखक थे।'

(महाविद्यालय के  मा. प्र प्राचार्य  प्रो. (डॉ.) सतीश घाटगे जी आपना मंतव्य व्यक्त करते हुए ) 

महाविद्यालय के प्र. प्राचार्य मा. प्रा. डॉ. सतीश घाटगे जी ने आपने मंतव्य में  कहा कि, “प्रत्येक भाषा की संरचना और सौंदर्य अलग होता है । विश्व में तीसरे स्थान पर बोली और समझी जाने वाली भाषाओं में से एक भाषा है । हिंदी भाषा ने  21 वी सदी में अन्य भाषाओं को अपना अस्तित्व ब्ंनाए रखने की चुनौती दी है । आधुनिक काल के  साहित्य में वास्तववादी चित्रण ज्यादा मात्रा में होना अपेक्षित है, लेकिन वास्तव को बाजू में रखने का प्रयास कर बाजारवादी साहित्य की निर्मिति करते साहित्य कारों पर जमकर प्रहार किया। 

सांगोष्ठी को सफल बनाने के लिए जिन-जिन लोगों ने सहायता की जिसमें महाविद्यालय के सेवक श्री. अजित जाधवजी के भांजे मा.श्री. मयूर दिलीप निकम जिन्होंने नगद रुपए देकर, तथा बसवअण्णा मिठाईवाले मा. श्री. नितिन बसवआण्णा चौगुले और सांगोष्ठी के लिए फाईल देनवाले मा. श्री. विरेंद्र हालिंगली (अल्टिमेट कलेक्शन विश्रांबाग, सांगली) तथा प्रस्तुत फाईल में दिए जाने वाला लेटर पॅड और पेन देनेवाले महाविद्यालय के गुरूदेव कार्यकर्ता मा. प्रा. मुरलीधर चौगुले आदि के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित न करते हुए मै इन सभी महानुभावों के ऋण में रहना पसंद करूंगा ऐसे मंतव्य व्यक्त किया। साथ ही इन सभी दाताओं के पास पहुंचने में मदद करने वाले शारीरिक शिक्षण संचालक प्रा. आकाशा बनसोडे तथा कॉमर्स विभाग अध्यक्षा प्रा. (डॉ.) शाहिदा जमादार के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित की। साथ ही सांगोष्ठी को सफल बनाने के लिए बनाई गयी सभी समिति और उसमें कार्य करने वाले सभी सदस्यों के प्रति तथा प्रशासकीय कर्मचारी और सभी सेवक जिन्होंने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से योगदान दिया उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। सांगोष्ठी को शुरू से आखीर तक मार्गदर्शन करने वाले मा. प्रो. (डॉ.) अर्जुन चव्हाण जी के प्रति विशेष कृतज्ञता ज्ञापित की। विषय विशेषज्ञ मा. प्रो. (डॉ.) श्यामराव  राठौड जी के प्राति भी कृतज्ञता ज्ञापित की।          

प्रस्तुत सांगोष्ठी के विषय विशेषज्ञ मा. प्रो. डॉ. श्याम राठौड जी मार्गदर्शन करते हुए ।






💐💐👍धन्यवाद 👍💐💐



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